गुरुवार, जून 04, 2009

रात के दो बजे

कुछ दिनों से ,दिन जल्दी ढल जाता है ,
मौसम में एकाएक बदलाव आ गया ,
पेडों के पत्ते झड़ कर जमीन पे बेसहारा पड़े हैं ,
कोयल पेड़ की ठूठ पे बैठी ,
चुप चाप आसमान में टकटकी लगाये ,
रात के दो बजे ,
खिड़की से झांक के देखा ,
सूरज पूरब से निकल रहा है ,
मैं घबरा गया ,कई बार घडी को देखा
वक्त वही हुआ है ...दो का ,
दरवाजे पे घंटी बजी ,घबरा के दरवाजे पे पहुँचा ,
डरते हुए उसे खोला ,
सामने एक भिखरी खडा ,मुझे घूर के देख रहा था ,
उसकी आखें सुर्ख लाल थी ,हाथ में एक चाकू था ,
वगैर कुछ सोचे समझे ,वो मुझ पर झपटा ,
घबरा के मेरी आँख खुल गई
सामने रखी ,घड़ी को देखा उसमे भी दो बज रहा था ,
कुछ सोच के खिड़की खोली ,सुनसान सड़क पे ,
एक भिखारी चला जा रहा था ,डर के मैंने खिड़की बंद की ,
सुबह होने तक जागता रहा ...................

2 टिप्‍पणियां:

रानी पात्रिक ने कहा…

सुन्दर कविता।

महामंत्री - तस्लीम ने कहा…

इसी बहाने आपके जीवन के कुछ पहलुओं से परिचय हुआ।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }