मंगलवार, जून 16, 2009

बोझ

सर का बोझ , बहुत भारी था ,
हल्का करने की कोशिश में ,
मन बोझिल होता जा रहा था ...
जब कुछ न समझ पाया तो ,
पास बहती नदी में - जा फेंका - बोझ को ,
गर्दन जो अभी तक अन्दर घुसी बैठी थी ,
अब टोपी वालों की तरह बाहर निकल आयी ,
अब मैं गर्दन उठा कर जीता हूँ ,
चार लोगों के बीच अमीर बन के रहता हूँ ,
मेरी अमीरी का राज ,हर कोई जानना चाहता है ,
छुप के लोग ,मुझ से अकेले में मिलते हैं ,
अपना दर्द बता के मुझे दुखी कर जाते हैं ,
अब जाना ......सच ,
अमीर होना कितना , अपाहिज होता है ...........

4 टिप्‍पणियां:

Nirmla Kapila ने कहा…

बहुत सत्य और सटीक अभिव्यक्ति है आभार्

महामंत्री - तस्लीम ने कहा…

विचार विमर्श के लिए प्रेरित करती रचना।

-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

अजय कुमार झा ने कहा…

chand panktiyon ne khoob gajab dhaayaa hai hujoor..

AlbelaKhatri.com ने कहा…

sar ka bojh aur man ka halkapan jab aap jaise rachnakaaron ke samaksh aate hain toh bahut khoobsoorti me dhal jaate hain
KAVITA BAN JAATE HAIN
waah
waah
bahut khoob !