बुधवार, जुलाई 01, 2009

खेल आखों का

पीछे छोड़ आया था ,एक अधुरा खेल ,
वर्षो पहले .....,
वो फ़िर सामने खड़ा आज ,
मुझे चिढाता ,हार की झंडी दिखा -दिखा कर ,
चाँद सा मुखडा दिखा कर ,
आँखों में सीने को कहता ,
हजारों पैमंद लगे हैं ,
मेरी पूरानी गुदडी में ,
जो मुझे हालात से अवगत कराते ,
अब कोई नया खेल न खेलना ,
उसकी इसी बात पर मुझे गुस्सा आता ,
शायर को ललकार रहा है कोई ,
इस बार फ़िर मैं कूदने को तैयार हुआ ,
नया पुल बना था नदी -पे ,
अभी तक कोई हादसा नही हुआ ,
कूद कर उसका मुहूर्त कर देता हूँ ....

2 टिप्‍पणियां:

ओम आर्य ने कहा…

sundar rachana ............badhaee

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत बढ़िया.