बुधवार, जुलाई 01, 2009

धूप

धूप खिली ,
पहाडों पे अच्छी लगती है ,
खिला -खिला मन मेरा ,
सौदागर ले कर गया ,
हाट में गुमटी के किनारे ,
सजा कर बैठ गया ,
भीड़ बहुत थी ,
उस दिन बाजार में ,
अच्छे बूढे जवान ,लडके लडकियाँ सभी उसकी दुकान तक आते ,
मुझे देख कर पसंद भी कर लेते ,
भावः इतना होता ,
सब मुरझाये मन से वापस चले जाते , एक होशियार चालाक लडकी बुर्के में आयी ,
मुझे देखा ,उसका जी मुझ पर आ गया ,
फ़िर क्या था --- उसने चुरा के मुझे ,
अपने बुर्के में दाल लिया ,
मैं उसके सीने से लगा ,
उसके घर तक पहुँचा ,
उसने सजा के मुझे एक ताखे में रख दिया ,
पल -पल मुझे निहारती ,
सोते समय अपने बगल में ले कर सोती ,
एक दिन उसके अब्बा को ,
उसका राज खुल गया ,
कुछ दिनों बाद उसका निकाह ,
जुम्मन मियां से कर दिया ,
मैं आज भी उसी ताखे में पडा हूँ ,
...कई सालो बाद वो --जब ...,
अपने घर लौटी ,
मुझे देख कर बड़ी खुश हुई ,
उसके साथ ...उसके तीन बच्चे ,
मुझे खिलोने की तरह ,घर के आँगन में खेलते ,
एक दिन ,मैं घर के नाबदान में जा गिरा ,
फ़िर बच्चों ने वहां से मुझे नही निकाला ,
वहीं पडा हुआ ,बरसात में बह के ,नदी में जा मिला ,
एक कैद से छुटकारा मिला ,
अब स्वतंत्र हो गया ,
अब मैं चेहरे की खुशी नही ....
बेचता ...........,
अकेला में .........,
अपने पुराने दिनों को याद कर के ,
थोडा सा रो लेता हूँ ,............

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