सोमवार, जुलाई 06, 2009

संस्कार

संस्कार एसा मिला उनकों ,
सर से पावं तक ,गुनाहगार हो गए ,
अपनों का खून करते हैं
मजहब के नाम पर जोड़ते हैं लोगो को ,
बच्चों को लेमनचूस दे कर ,
गोली चलाना सिखातें ,
उनका भगवान् कहाँ सो रहा ?
क्यूँ उनके पाप की सजा नही देता ?
जबरदस्ती अपनी गरीबी दिखा कर ,
दुसरे देशों से भीख में ,दो वक्त का खाना पाते ,
वही आधा खा के ,
आधे से बन्दूक खरीदते ,
बेगुनाहों को मौत का फरमान देते ,
कब तक येसा चलेगा ,
कहतें हैं वो जब तक पूरे संसार को ,
अपने रंग में रंग नही लेते .....

4 टिप्‍पणियां:

शारदा अरोरा ने कहा…

खून का तो एक ही रंग होता है , लाल , जब बहाते हैं तो बड़ा भयावह और जब रगों में दौड़ता है तो एक रिश्ते का अहसास दिलाता है , क्या हम सब एक ही सूत्र में नहीं बंधे हैं , खून अगर एक नहीं दिखता, तो एक नूर देखने वाली नजर ही पैदा कर लें |
आपने कविता के रूप में व्यथा को शब्द दे दिए हैं |

नीरज गोस्वामी ने कहा…

भगवान कहाँ सो रहा था....ये शाश्वत प्रश्न है...जवाब किसी के पास नहीं...बहुत अच्छी रचना...
नीरज

‘नज़र’ ने कहा…

बहुत शुद्ध रचना है

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चर्चा । Discuss INDIA

Udan Tashtari ने कहा…

सही है, उम्दा रचना.