गुरुवार, नवंबर 12, 2009

९१ कोजी होम

लोकनाथन जी से मेरी पहचान में कुछ फर्क नही पडा ,फ़िर काम की तलाश शुरू हो गई
एक नए काम की .....अपने पुराने लोगों से मिलने लगा ,एक काम या एक नौकरी के लिए
इसी बीच रूपतारा स्टूडियो गया जो दादर पूरब में था ,वहां विकाश मोहन का आफिस था
लिबास फ़िल्म के दौरान अच्छी पहचान हो गई थी ......उनसे ..मैं लिबास का मुख्य सहायक
था इसलिए मेरी इज्जत करते थे ......दो चार घंटे उनके आफिस बैठा रहा .....यही पता चला
डी डी पे उनकों एक सीरियल मिल गया था बनाने के लिए । डी डी का मतलब (दूरदर्शन )
से है ,उस समय कोई चैनेल और नही थे ....सिर्फ़ दूरदर्शन ही था ...और प्राइम टाइम शाम सात
से दस बजे का होता था । सीरियल का नाम था , " किस्सा शांती का " मुझे निर्देशन का काम
सौपा मैं बहुत खुश हुआ .....
कुछ महीनों में मैंने चार एपिसोड बना दिया .......इसी बीच राजा बुन्देला से विकाश का झगडा
हो गया .....इस सीरयल में वह ....बहुत खाश किरदार कर रहे थे .....सीरयल बनते बनते रुक गया
दो साल तक इसी झगडे में पडा रहा .......इसी बीच अंगूर के निर्माता जय सिंह मुम्बई आए .....और मुझसे
मिले और कहने लगे .......की उन्हें गुलज़ार साहब ने बुलाया है .....मिर्जा गालिब सीरियल बनाने के लिए
यह सीरियल गुलज़ार साहब के नाम से पास था ......पर गुलज़ार साहब ख़ुद निर्माण नही करना चाहते थे
यह जिम्मेवारी जय सिंह को देना चाहते थे .......इन दोनों के बीच में मुझे एक कड़ी का काम करना था

गुलज़ार साहब इस सीरयल को १६ यम .यम .में बनाना चाहते थे ....मतलब फ़िल्म फार्मेट पे
पर फ़िल्म फार्मेट पे फायदा नहीं था ......निर्माता को नुकशान था ....जय सिंह को विडियो फार्मेट और फ़िल्म
फार्मेट के बारे में कुछ नही मालूम था ......सब मुझ पर था ......मैं जय सिंह की तरफ़ से काम कर रहा था
मैं जय सिंह का नुकशान नहीं चाहता था .....निर्माता को सिर्फ़ एक टेलीकास्ट का राइट्स था बाक़ी सब गुलज़ार
साहब के पास था ...... ।
आख़िर मिर्जा ग़ालिब विडियो फार्मेट पे ही बनी ........

इस सिरिअल को मैंने एक निर्माता की तरह हैंडिल किया ......फिल्माल्या स्टूडियो में बल्ली मारा
का सेट लगा ....जो चांदनी चौक के पास एक जगह का नाम है जहाँ गालिब साहब रहते थे .......
यह वह दौर था जब मैं बहुत खुशहाल था .....काम था धन था ....इज्जत थी ,कितने लोगो को काम दिलाया
और वह लोग आज बहुत बडे लोग हैं ...नामी हैं ........और वह लोग मेरे इस काम कीवजह से बडी इज्जत
करतें हैं .....

4 टिप्‍पणियां:

अजय कुमार ने कहा…

बहुत उतारचढाव देखा आपने ,और मिर्जा ग़ालिब जैसा बेहतरीन सीरियल के लिए आपको बधाई

vimal verma ने कहा…

मिश्रा जी, आपका अनुभव आपकी पोस्ट में झलकता है.....मुम्बई के स्टुडियो के बारे में अगर आप और विस्तार से लिखते तो और मज़ा आता........मैने बहुत से स्टुडियो के बारे में सुना है जो अब प्राय: बन्द ही रहते हैं कभी तो गुलज़ार रहा होगा...उन गुलज़ार लम्हों पर भी कुछ पोस्ट आपकी आनी चाहिये...अच्छा लिख रहे है..पर वर्तनी की अशुद्धियों को भी सुधारते चलिये..बहुत बहुत शुक्रिया

ओम आर्य ने कहा…

मिर्जा गालिब एक ऐसी सिरियल है जिसे एक धरोहर कही जा सकती है ...........कोई भी संघर्ष बेकार नही जाती ..........मुझे ऐसा लगता है !!!!!!!
आप सुनाते रहे.....

इरशाद अली ने कहा…

अभी तक तो मैं आपको सिर्फ पढ़ रहा हूं।