गुरुवार, दिसंबर 31, 2009

९१ कोजी होम

एक शाम ,मैं किसी काम से गुलज़ार साहब से मिलने उनके बंगले में मिलने
गया था .....मेरे पास मोटर साईकिल थी ,जो बड़े बेटे की थी ....मैं अब नहीं चलाता था ...फिर भी उसी से गया था .....वजह थी नई ....अभी कुछ महीने
पहले उसने खरीदा था .....होंडा की करिज्मा थी ......उस पे बैठने का अलग मजा है ....
मैं गुलज़ार साहब से बात -चीत करता रहा ,जब चलने को हुआ
तो आदतन गुलज़ार साहब मेहमान को दरवाजे तक छोड़ने आते हैं .....बंगले का गेट खुला ....मैंने पैर छुआ .....तभी उन्होंने ने पूछा कैसे आये हो ?सामने
खडी होंडा की करिज्मा को दिखाया .....पता नहीं क्या सोच के वो उस मोटर
साइकिल तक पहुंचे और छू कर देखा .......फिर मेरी तरफ देख कर पूछा ...
तुम चला लेते हो ...मैंने हाँ में सर हिलाया .....तभी उनको कुछ याद आया और
मुझे देख कर कहने लगे .......मुझे दांत के डाक्टर के पास छोड़ दो .....सुन्दर भी कही गया हुआ है ........पास खड़े नौकर को बोला ....सुन्दर आये तो उसे दांत वाले डाक्टर के पास भेज देना ......गाडी ले कर ..सुन्दर २५ साल से उनकी कार चला रहा ...जवानी में आया था आज उनके साथ बूढा भी हो गया

गुलज़ार साहब मोटर साईकिल पे बैठे ...मैं चलाने लगा ...वो मुझे रास्ता बताते रहे .....थोड़ी देर में हम लोग डाक्टर के पास पहुँच गये ...
राह चलते हुए लोग गुलज़ार साहब को देखते रहे ...यह वहीं हैं या कोई और है
.....उतरने के बाद गुलज़ार साहब ने बताया ...".मेरे अपने"फिल्म में शत्रु की मोटर साईकिल पे बैठा था सन ७१ में, इस फिल्म की शूटिंग मोहन स्टूडियो
में हो रही थी ....मोहन स्टूडियो अब बंद हो चुका है वहां बड़ी -बड़ी बिल्डिंग बन
चुकी है .....आज जब उधर से गुजरता हूँ .......सडक पे खड़े हो कर देखता रहता हूँ .......हर पल एक न एक कुछ खोता ही जा रहा है .....बस यादें ही रह गयी हैं

3 टिप्‍पणियां:

yunus ने कहा…

भाई साहब ये आपका ब्‍लॉग नहीं है । भविष्‍य की आपकी पुस्‍तक है । लिखते रहें । हम पढ़ रहे हैं ।
गुलज़ार साहब की तो शानदार यादें सामने आ रही हैं आपके ज़रिए ।

yunus ने कहा…

उनसे विविध भारती के लिए इंटरव्‍यू करने की तमन्‍ना है

अजय कुमार ने कहा…

सरल व्यक्ति ही सरल और सहज लेखन कर सकता है ।