चलो एक दुसरे की परछाई पकड़ के चलें ,
जिससे साथ छूटने ना पाए हमारा -तुम्हारा ,
दिन ढलते ही ........
परछाईं साथ मेरा छोड़ के दूर भाग निकली ,
मैं अलसाई आखों से उसे जाते हुए देखता रहा ,
घु़प अंधेरे में खडा ,देखता हुआ अपने को आईने में ,
एक परछाई नज़र आई आईने में ,
अ़ब समझा जो शाम में खो जाती है ,
रात में शीशे में समा जाती है ,आराम करने को ...
अब मुझे अपने साए ,के छुपने का राज पता चल गया ,
मुझे अब पहले जैसी घबराहट नही होती ...............
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बुधवार, जून 17, 2009
सोमवार, जून 15, 2009
सोच
उम्र के साथ -साथ ,अपनी सोच पे,
एक लकीर खींच दी ,अब वही कहूँगा ,
जो मेरी उम्र के साथ जाय,
अब कुछ कहा जाता नही ,
जो कहता हूँ वो सब समझते नही ,
या फ़िर पढा नही जाता ,
कुछ सोच के ,फ़िर से मैंने अपनी सोच को ,
खुला छोड़ दिया ..............
अब आप बताइए ,क्या करूं ,
एक लकीर खींच दी ,अब वही कहूँगा ,
जो मेरी उम्र के साथ जाय,
अब कुछ कहा जाता नही ,
जो कहता हूँ वो सब समझते नही ,
या फ़िर पढा नही जाता ,
कुछ सोच के ,फ़िर से मैंने अपनी सोच को ,
खुला छोड़ दिया ..............
अब आप बताइए ,क्या करूं ,
सोमवार, जून 08, 2009
चर्च
रोज़ की तरह ,आज भी उसी वक्त को सोच रहा था ,
वो यादें , वो पल ,वो लड़ना ,सब ऐसे याद है ,
जैसे किसी फ़िल्म का कोई हिस्सा हो ,
जो बीसों वर्षों से वैसा ही चल रहा हो ,
कुछ बदला नही ,मेरी सोच में ,बदला है तो सिर्फ़ शोच का रंग ,
अपने पोतों में वही रंग देख कर लगा , कुछ नही बदलता ,
बस वक्त की घडी आगे नयी शक्ल में आ जाती है ,
हम आज भी वहीं खडे -१९२० का वो पल देख रहे थे ,
सिर्फ़ भूगोल की शक्ल आज वैसी नही है ,
बांद्रा से महिम तक जाने के लिए ,नाव का इस्तेमाल किया जाता था ,
वहां एक चर्च है - जहाँ मैं उससे ,हर बुधवार को मिलता था .............
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