सोमवार, मई 18, 2009

कोजी होम ९१

इस घर से बहुत सारी यादें जुड़ी हैं बरसात का महिना था ,हलकी -हलकी बारिस हो रही थी ,हाथ में दो किताबे ,जिसे मुझे ९१ कोजी होम में पहचाना था भीगता हुआ वहां पहुँचा ,किताबो को मैंने भीगने नही दिया था
दरवाजा खुला सामने एक दुबला- पतला इन्सान खडा था , उसने मुझे घूर कर देखा , नौकर लग रहा था
हिम्मत कर के पूछा,गुलजार साहब हैं ?फिर उसने मुझे देखा, फ़िर सर हिला कर अंदर आने को कहा ,मैं झिझकता हुआ अंदर पहुँचा वो आदमी दुसरे कमरे में चला गया ,मैं वहीँ खड़ा, उस घर को देखता रहा
थोडी देर बाद गुलजार साहब बाहर आए ,मुझे भीगा हुआ देखा ,वह कुछ कहते, उससे पहले वह दोनों
किताबे उनकी तरफ बढ़ा दी ,और कहा रामलाल जी ने आप के लिये भिजवाया है यह सुनकर
गुलजार साहब बहुत खुश हुए, और मुझे अंदर बैठने को कहा

8 टिप्‍पणियां:

अमित ने कहा…

bhai vah!
bhangar ji
yah ap ki yaadon ka bhangar hai
ya aur kuch
phir bhi achchh laga
badhai

दिल दुखता है... ने कहा…

आपका हिंदी ब्लॉग की दुनिया में तहेदिल से स्वागत है......

Manoj Kumar Soni ने कहा…

बहुत अच्छा लिखा है . कृपया मेरा भी साईट देखे और टिप्पणी दे
वर्ड वेरीफिकेशन हटा दे . इसके लिये तरीका देखे यहा
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नारदमुनि ने कहा…

narayan narayan

pawankumarmall ने कहा…

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भंगार ने कहा…

aap sabhi logo ne mujhe jaana vahi bahut achchhaa laga.

भंगार ने कहा…

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संगीता पुरी ने कहा…

बहुत सुंदर…..आपके इस सुंदर से चिटठे के साथ आपका ब्‍लाग जगत में स्‍वागत है…..आशा है , आप अपनी प्रतिभा से हिन्‍दी चिटठा जगत को समृद्ध करने और हिन्‍दी पाठको को ज्ञान बांटने के साथ साथ खुद भी सफलता प्राप्‍त करेंगे …..हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।