शुक्रवार, जुलाई 17, 2009

झूंठ की किताब

चुल्लू भर पानी में ,
डूबने की आदत पड़ गयी ,
खूब झूंठ बोलता हूँ ,
कसमें इस तरह खाता हूँ ,
जैसे लोग मन से ,
छोले -भटूरे खाते हैं ,
झूठ की दुकान मेरी ,चल निकली ,
सेठ बन कर गद्दी पे बैठता हूँ ,
लोग मुझसे मिलने के लिए ,
लाइन में घंटो खडे रहते हैं ,
बडे नेता -अभिनेता .....,
रात के दुसरे पहर में आते हैं ,
जब लोग सो जाते हैं ,
मेरी फीस बहुत ज्यादा है ,
झूठ की तरकीब को ,
तरतीब से लगाना सिखाता हूँ ,
...परिवार मुझसे दूर जा बसा ,
मेरी आखों के आसूं सूख चुके हैं ,
मोह किसी रहा नही ,
जो कुछ हूँ ...........,
बस आदमी के रूप में ,
एक सड़ा हुआ अमरुद हूँ ,
घिन हो गयी .........,
इस सडे हुए इन्सान से ,
फ़िर भी जी रहा हूँ ,
अपनी झूठ की पोथी को चलाने के लिए .....,

2 टिप्‍पणियां:

संगीता पुरी ने कहा…

भावों की अच्‍छी अभिव्‍यक्ति !!

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत सटीक!