सोमवार, नवंबर 09, 2009

९१ कोजी होम

सुभाष जी के साथ काम करते हुए , करीब महीना बीत चुका था ।
इनके यहाँ , दस तारीख को वेतन मिल जाता था ,पर मुझे नहीं मिला
मैंने दो रोज बाद ,उनके कैशियर से बात की ,उसने बताया ...सुभाष जी
ने आप के लिए कुछ नही कहा ........अब मैं मुश्किल में पड़ गया ....सुभाष जी
को कैसे कहूँ ...यही सोच कर चुप रहा .....कर्मा फ़िल्म की एडिटिंग चल रही थी
मैं सुभाष जी के साथ ही था ......एडिटर वामन साहब थे ...लंच टाइम में ....सुभाष जी
मुझ से बात कर रहे थे .....तभी अचानक उन्होंने मुझ से पूछा .....तुम्हे सैलेरी मिल
गयी .....मैंने कहा आप ने ....मेरे लिए कुछ कहा नही आफिस में ? ....तुंरत मुझे फोन
करने लिए कहा .....परी से मेरी बात कराओ ....मैंने उनके आफिस फोन मिलाया और
परी से बात कराया ...परी का नाम ...परवेज था पर सुभाष जी उनकों परी कह के बुलाते थे
यह सुभाष जी के सब से छोटे साले थे ....परवेज से बात करते हुए ....उन्हें लगा , अगर उन्होंने
कहा होता तो ...मुझे तन्खाह जरुर मिली होती .....एक हाथ में फोन पकड़े मुझ से बात करने
लगे ....तुम्हे ..गुलज़ार साहब के यहाँ कितनी सैलिरी मिलती थी ?......एक पल सोच में पड़ गया ....
मैंने कहा सात सौ .....! अगला सवाल उनका था ....तुम्हारे कितने बच्चे हैं ? मैंने कहा ...तीन ... ।
......कुछ सोच कर कहा उन्होंने ...इतने पैसे में ...कैसे गुज़ारा करते हो ? ..फ़िर .....एक चुप्पी ...क्या बोलता
फ़िर कहने लगे ...तीन बच्चों को गुजारे के लिए ...कम से कम तीन हजार रूपये होने चाहिये ....
फ़िर मेरी तरफ़ देखा सन ८६ में इतनी सैलिरी बहुत अच्छी होती थी ...... उस वक्त ......मैं चुप रहा ,फ़िर
उन्होंने फोन पर परवेज से तीन हजार की बात कही .....आज मैं बहुत खुश था ....और मुझे तीन हजार
सैलिरी मिलने लगी .....
अक्सर सुभाष जी के साथ सवांद पे उनके साथ बैठता था ....खलनायक जैसी कहानी
मैंने उनको सुनाई थी ...उस कहानी का नाम ...मैंने विलेन रखा था ...और मैंने शत्रु जी को सोच के
लिखा था ......कालेज के टाइम में ....एक लडका जो दादा गर्दी करता है ....और उसी कालेज में पढ़ने
वाली लड़की जिसे यह लड़का प्यार करता है ......पर उसे जबरदस्ती नही अपनाना चाहता है
समय बदला और कालेज का लडका .......फिल्मों में एक विलेन का किरदार करने लगा और बहुत
नामचीन हो जाता है ........कालेज की वो लडकी जिसे प्यार करता था .....उस लडकी हम शक्ल बेटी मुम्बई
आती है और उस विलेन के संपर्क में आती है ........आगे की भी कहनी बताई ,,पर यहाँ .........

सुभाष जी के साथ काम करते हुए .....एक और निर्माता आया और वो एक महीने में फ़िल्म
बनाना चाहता था ......पर फ़िल्म राजस्थानी जबान में थी ......और मुझे यह जबान आती नही थी ,फ़िर भी निर्माता
जबदस्ती करने लगा .........सिर्फ़ एक महीने की बात है ........और पचास हजार रूपये मिलें गें ......एक लालच
मेरे साथ चिपक गया ..........उस फ़िल्म का नाम था ....थारी -म्हारी ...हिन्दी में तेरी मेरी से मतलब है

3 टिप्‍पणियां:

अजय कुमार ने कहा…

आपके संघर्ष को समझा जा सकता है

ओम आर्य ने कहा…

संघर्ष से भरी पडी है आपकी दास्तान .......मुझे बहुत कुछ सिखने को मिल रहा है .....

vimal verma ने कहा…

संघर्ष की बातें पढ़ना और सुनना अच्छा लगता है,आप अपना किस्सा सुनाते रहें हम हैं न सुनने को.....लगे रहें...