शुक्रवार, जून 28, 2013

अर्जुन

कमरे में ...एक बेंच पड़ी थी जिस पे बैठने को कहा .....लेकिन वह बैठी नहीं ......साहब पैसा नाय बाय .....फिसिया ना दय पाइब .....नाव नैय काटा .....अगले महीना एकर बपवा बम्बई गय बाय ......दय देब

      ठीक है ......नाव नहीं कटेगा ,,,इसको क्लाश में भेज दो ....और तुम भी जावो .....चिंता मत करो किसी बात की ....अच्छा साहब हम .....जाईत है ............वह औरत चली गयी .....अर्जुन ने पूछा चाय लेंगे ....और फिर खुद ही बोल पडा मैं तो दिन में चार पांच बार चाय पीने  की आदत बन गयी है .........तभी सामने से कोई गुज़रा ...अर्जुन ने आवाज दे के बुलाया ....अरे यादव जी ...किसी से कहिये दो चाय भिजवा दे .....

           दो दिन से मेरे बारे में पूछ रहे हो .... अपने बारे कुछ नहीं बतलाया .....सुना है ,फिल्मो में कहानी लिखते हो उनका निर्देशन भी करते हो ......यह तो आप की बचपन की इच्छा थी .....मैं अपने बारे में क्या बतलाऊं .....
आप ने जो काम किया ......उसकी गिनती नहीं है ....यह सुन के अर्जुन बोल पड़ा .......अस्तित्व की लडाई में यह सब करना पडा ....हमें तो आप के बारे में बात कर के अच्छा लगता है .......मैं तो लोगो से कहता फिरता हूँ मेरे दोस्त फिल्मो में हैं ......आज समाज पे फिल्मों का रंग ऐसा छाया हुआ .....हमारे स्कूली बच्चे सलमान को जानते है उतना किसी नेता को नहीं जानते ......आज वाले नहीं ...कल वाले जिनको हम अपना आदर्श मानते थे ...........

                  तभी केतल में चाय आ गयी ....छोटे -छोटे मिटटी के कोसे आ गये ......और उन में चाय पीने  का

एक अगर लुफ्त

1 टिप्पणी:

vandana gupta ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार(29-6-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
सूचनार्थ!